Saturday, October 17, 2009

अंतरात्मा और प्रश्न

एक जाग्रति एक आन्दोलन में जी रहा हूँ मैं ,
न कारण न उद्देश्य बस चलता जा रहा हूँ मैं।
क्या है सत्य क्या असत्य नहीं जन रहा हूँ मैं,
कभी इस दिशा कभी उस दिशा बस उड़ता जा रहा हूँ मैं।

एक अनजान अलोकिक ताकत ने उठा रखा है मुझे,
कुछ न कुछ कहके उड़ा रखा है मुझे
कभी सागर कभी पर्वत बना रख है मुझे
कभी अतिशांत अभी अतिविभस्त बना रखा है मुझे

एक अनजान की खोज से असंतुलन में हूँ मैं,
स्वम को जानने की चेष्ठा से अवसाद में हूँ मैं.
क्या स्वारथ क्या व्यर्थ से उकता गया हूँ मैं ,
रोष, द्वेष और उन्माद से बौरा गया हूँ मैं.

कभी आईने में ख़ुद को देखने से भी भागता हूँ मैं,
तो कभी ख़ुद को शक्ति पुंज मानता हूँ मैं.
कभी स्वयं को अणु से छोटा कभी महासागर से विशाल मानता हूँ मैं,
कब क्यूँ और क्या करना है यह भी नहीं जनता हूँ मैं.

मैं बहुत निकृष्ठ और अनुचित कम भी करता हूँ मैं,
इसको छपने के बजाये अहम् के साथ स्वीकारता हूँ मैं.
बस अपने अहम् अपने अभीमान को ही प्रणाम करता हूँ मैं,
बस अपने अहम् अपने अभीमान को ही प्रणाम करता हूँ मैं.