cogito ergo sum
Friday, February 5, 2010
दिल में जो तस्वीर थी तेरी, उसे तो कब का जला दिया
अब तो न तुम हो न तुम्हारी यादें .
पर क्यूँ जलती है आँखों को तेरी तस्वीर का धुआं?
जब दिल के रेत पर लिखा तेरा नाम वक़्त के समंदर ने कब का मिटा दिया.
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