Sunday, May 1, 2011

समय

न रूकती न थकती, यह सुइयां निरंतर चलती
समय असमय याद दिलाती, आज और कल में भेद बताती

मैं और मेरे सपने कल के, बीच में केवल मृत्यु ही आ सकती 
मैं और मेरी मृत्यु के बीच में सब कल्पना ही तो है जो आती जाती

चेतना और वेदना का ताना बना, संसार भावनाओं का कारखाना
भेद बताते, नाओं  खेते, कभी रोते, कभी बिलखते, और कभी चुप ही हो जाते

आखों में जीवित कई चेहरे, जो बस हमेश मुस्कुराते 
किसने किससे घ्रिडा ख़तम की? लगता है अब बस पीड़ा ख़तम हुई!!!

लगता है की अब बस पीड़ा ख़तम हुई!!!