Sunday, July 18, 2010

जो भी हो!!!

परोक्ष अपरोक्ष रूप!
कलि है छाया पर सुनहरी धुप!!
जीवन का अंत; अनंत
मृत्यु की ओर अग्रसर; जीवन पर्यंत

प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष वास्तविकता
रूदिवादिता या अधोनिकता
धर्म अधर्म का मायाजाल
खोया चेतन असामयिक काल

सूक्ष्म या वृहद् ज्ञान
सागर सामान अभिमान
शंभंगुर तन नित नयी काया
ना जाने कहाँ जाना है, न जाने क्यूँ आया?

ज्वार भाता या रक्तचाप
निरंतर चलता विभात्सा नाच
योधाओं का महा घमासान
विजय पराजय और वर्त्तमान

भक्ति योग और भोग
मृत्युलोकियूं के अलोकिक बोल
सहमे से आदर्श झूटी सांत्वना
सच नित लज्जित भावना

पर तज देना भी उपाय नहीं
खोज में जुटे रहना या खो जाना कहीं
पथ मात्र पथिकों के ही
विश्वास को बलवान करो बस अभी
विश्वास को बलवान करो बस अभी

3 comments:

  1. Nit Nayi Kaaya....waah waah....

    Looks great

    Poetry mei Phd kar le re bhai....( Agar original hai to :P)

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  2. Vishwas par tp sansaar ki dhuri tiki hai Bandhu....Kuch naya likho :P

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  3. bhaiya original hi hai!!! copy kyun kareinge hum??? :)

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