जो मुझमें ही था, उसी को पाने को तरसे!
हस्ती को नहीं पहचाने जाने को तरसे!!
बनाना था मजहब, खुदा से मिलने का!
खुदा को मजहब का जामा पहना डाला!!
जिंदगी मिली थी जीने के लिए!
उसे रिश्तों के तकल्लुफी में गवां डाला!!
आये थे प्यार करने और प्यार पाने को!
प्यार को उम्मीदों के लेन-देन में घोंट के मार डाला!!
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